नारी शक्ति पर राजनीतिक विराम: जनगणना, परिसीमन और सामाजिक न्याय के बीच झूलता लोकतांत्रिक संतुलन
Political Pause on Women's Empowerment
लेखक : डॉ अशोक कुमार रंगा
रोहतक, सुकरमपाल 20 अप्रैल : भारतीय लोकतंत्र की आत्मा “एक व्यक्ति, एक वोट, एक मूल्य” के सिद्धांत में निहित है। यही वह आधार है जो प्रत्येक नागरिक को समान अधिकार और समान महत्व प्रदान करता है। किंतु जब व्यवहारिक व्यवस्था इस सिद्धांत से भटकने लगे, तब लोकतंत्र की गुणवत्ता पर प्रश्न उठना स्वाभाविक हो जाता है। आज महिला आरक्षण, जनगणना, परिसीमन और सामाजिक प्रतिनिधित्व को लेकर जो बहस चल रही है, वह केवल एक विधेयक का विषय नहीं, बल्कि लोकतंत्र की समग्र संरचना और उसके संतुलन का प्रश्न बन चुकी है।महिलाओं को राजनीतिक रूप से सशक्त बनाने के उद्देश्य से प्रस्तुत महिला आरक्षण संशोधन विधेयक (131वां संविधान संशोधन) एक ऐतिहासिक अवसर था। इसका उद्देश्य लोकसभा और विधानसभाओं में महिलाओं को 33 प्रतिशत आरक्षण देकर उन्हें निर्णय प्रक्रिया में समान भागीदारी देना था। वर्तमान में लोकसभा में महिलाओं की हिस्सेदारी लगभग 14 प्रतिशत है, जो देश की आधी आबादी के अनुपात में अत्यंत कम है। प्रस्ताव यह था कि लोकसभा की 543 सीटों को बढ़ाकर लगभग 816 किया जाए और इनमें से लगभग 33 प्रतिशत, यानी लगभग 269 सीटें महिलाओं के लिए आरक्षित की जाएं। यह परिवर्तन न केवल महिलाओं के लिए, बल्कि लोकतंत्र की गुणवत्ता के लिए भी महत्वपूर्ण होता। यदि यह विधेयक पारित हो जाता, तो 2029 के आम चुनावों में ही महिलाओं का प्रतिनिधित्व 14 प्रतिशत से बढ़कर 33 प्रतिशत तक पहुंच सकता था। लेकिन संसद में यह विधेयक आवश्यक दो-तिहाई बहुमत के अभाव में पारित नहीं हो सका। परिणामस्वरूप महिलाओं को मिलने वाला यह अधिकार फिलहाल टल गया और अब इसके 2034 तक खिसकने की संभावना व्यक्त की जा रही है। यह विषय केवल महिलाओं तक सीमित नहीं है। संसदीय सीटों की संख्या बढ़ने का सीधा लाभ अनुसूचित जाति (एससी) और अनुसूचित जनजाति (एसटी) वर्ग को भी मिलना था। वर्तमान में इन वर्गों के लिए आरक्षित सीटों की संख्या सीमित है, क्योंकि कुल सीटों की संख्या 543 पर स्थिर है। यदि सीटों की संख्या 816 तक बढ़ती, तो उसी अनुपात में एससी और एसटी वर्ग के लिए आरक्षित सीटों में भी वृद्धि होती। इससे इन वर्गों का राजनीतिक प्रतिनिधित्व मजबूत होता और सामाजिक न्याय की दिशा में एक बड़ा कदम उठता। अनुसूचित जाति और अनुसूचित जनजाति वर्ग ऐतिहासिक रूप से सामाजिक, आर्थिक और शैक्षणिक रूप से वंचित रहे हैं। संविधान निर्माताओं ने इस असमानता को दूर करने के लिए आरक्षण की व्यवस्था की थी, ताकि इन वर्गों को समान अवसर मिल सके। संसद और विधानसभाओं में इनका प्रतिनिधित्व केवल राजनीतिक भागीदारी का प्रश्न नहीं, बल्कि सामाजिक न्याय और समानता की दिशा में एक आवश्यक साधन है। ऐसे में सीटों की संख्या बढ़ने से इन वर्गों को मिलने वाला अतिरिक्त प्रतिनिधित्व एक सकारात्मक परिवर्तन ला सकता था। लेकिन महिला आरक्षण संशोधन विधेयक के पारित न होने से यह पूरा लाभ भी फिलहाल टल गया है। इससे यह प्रश्न उठता है कि क्या इस निर्णय से इन वर्गों की अपेक्षाओं को भी आघात नहीं पहुंचा है? इस पूरे विषय को समझने के लिए वर्तमान संसदीय संरचना की असमानता को देखना आवश्यक है। आज लोकसभा की 543 सीटें 1971 की जनगणना के आधार पर निर्धारित हैं। पिछले पांच दशकों में देश की जनसंख्या में भारी वृद्धि हुई है, लेकिन प्रतिनिधित्व का ढांचा उसी अनुपात में अद्यतन नहीं हुआ। इसका परिणाम यह है कि आज संसदीय क्षेत्रों के बीच मतदाताओं की संख्या में भारी असंतुलन देखने को मिलता है। देश में लगभग 127 संसदीय क्षेत्र ऐसे हैं, जहाँ 20 लाख से अधिक मतदाता हैं। इतनी बड़ी संख्या में मतदाताओं के बीच एक सांसद का प्रभावी संवाद स्थापित करना कठिन हो जाता है और जनसमस्याओं का समाधान भी प्रभावित होता है। इसके विपरीत, कुछ संसदीय क्षेत्र ऐसे भी हैं जहाँ मतदाताओं की संख्या मात्र 60 हजार तक सीमित है। यह स्थिति लोकतंत्र के उस मूल सिद्धांत को कमजोर करती है, जिसमें हर वोट की समान कीमत होनी चाहिए। इसी असमानता को दूर करने के लिए परिसीमन आवश्यक है, लेकिन यह प्रक्रिया लंबे समय तक फ्रीज रखी गई। अब जब यह विषय पुनः चर्चा में है, तो यह केवल सीटों के पुनर्वितरण का प्रश्न नहीं, बल्कि लोकतंत्र को अधिक संतुलित और प्रभावी बनाने का प्रयास है। जनगणना इस पूरी प्रक्रिया की आधारशिला है। 2021 की जनगणना कोविड-19 महामारी के कारण नहीं हो सकी, लेकिन अब 2026 की जनगणना आरम्भ हो चुकी है। यह जनगणना दो चरणों में संपन्न होगी और दूसरे चरण में जातीय जनगणना भी की जाएगी, जिसका निर्णय केबिनेट द्वारा 2025 में लिया जा चुका है। वर्तमान में यह प्रक्रिया जारी है, लेकिन ओबीसी वर्ग की महिलाओं की विस्तृत गणना अभी शेष है। सरकार ने स्पष्ट किया है कि इन आंकड़ों के आधार पर ही संसद में अंतिम निर्णय लिया जाएगा। इस विषय की ऐतिहासिक पृष्ठभूमि भी महत्वपूर्ण है। 1951 और 1971 की जनगणना के दौरान जातीय जनगणना का विरोध हुआ था। 1957 में काका कालेलकर आयोग की रिपोर्ट आई, लेकिन उसे लागू नहीं किया गया। 1980 में मंडल आयोग की रिपोर्ट आई, जिसे भी तत्काल लागू नहीं किया गया और अंततः 1990 में वी. पी. सिंह सरकार ने इसे लागू किया। यह इतिहास दर्शाता है कि सामाजिक न्याय से जुड़े मुद्दे हमेशा समय और सहमति की प्रक्रिया से गुजरते रहे हैं। यदि वर्तमान प्रक्रिया के अनुसार पहले जनगणना, फिर परिसीमन और उसके बाद आरक्षण लागू किया जाता है, तो यह पूरा चक्र 2030 के बाद ही पूरा होगा। इसका अर्थ है कि महिलाओं के साथ-साथ एससी और एसटी वर्ग को मिलने वाला अतिरिक्त प्रतिनिधित्व भी 2034 तक टल जाएगा। दक्षिण भारत के राज्यों को लेकर भी एक नरेटिव प्रस्तुत किया गया कि परिसीमन के बाद उनका प्रतिनिधित्व कम हो जाएगा। लेकिन तथ्य इसके विपरीत हैं। वर्तमान में दक्षिण भारत के पांच प्रमुख राज्यों का प्रतिनिधित्व लगभग 23.76 प्रतिशत है, जो परिसीमन के बाद बढ़कर लगभग 23.87 प्रतिशत हो जाएगा। इससे स्पष्ट है कि उनका प्रतिनिधित्व घटने के बजाय बढ़ेगा। इसी बीच विपक्षी दलों द्वारा ओबीसी और मुस्लिम महिलाओं के लिए पृथक आरक्षण की मांग उठाई गई। यह मांग समावेशी प्रतीत होती है, लेकिन इसके संवैधानिक पहलुओं पर प्रश्न उठते हैं। भारतीय संविधान धर्म के आधार पर आरक्षण का प्रावधान नहीं करता। ऐसे में यह मांग व्यावहारिक और संवैधानिक दोनों दृष्टियों से चुनौतीपूर्ण है। अंततः यह प्रश्न भारतीय लोकतंत्र के सामने खड़ा है—क्या “एक वोट, एक मूल्य” का सिद्धांत वास्तविकता में लागू हो पाएगा? क्या महिलाओं के साथ-साथ अनुसूचित जाति और जनजाति वर्ग को भी उनका बढ़ा हुआ प्रतिनिधित्व मिल पाएगा?
इन प्रश्नों का उत्तर सरकार की उस प्रतिबद्धता में निहित है, जो महिला आरक्षण के संदर्भ में देखने को मिली। यह स्पष्ट है कि नारी सशक्तिकरण और सामाजिक न्याय के प्रति गंभीरता बनी हुई है। जनगणना, परिसीमन और आरक्षण की चरणबद्ध प्रक्रिया यह संकेत देती है कि यह विषय केवल घोषणा तक सीमित नहीं है, बल्कि इसे लागू करने की दिशा में निरंतर प्रयास जारी हैं। इस प्रकार, भले ही वर्तमान में यह अधिकार टल गया हो, लेकिन यह भी उतना ही स्पष्ट है कि नारी शक्ति, अनुसूचित जाति और जनजाति वर्ग को उनका बढ़ा हुआ संवैधानिक अधिकार दिलाने की दिशा में सरकार की तरफ से प्रतिबद्धता बनी हुई है। यही विश्वास लोकतंत्र की सबसे बड़ी ताकत है—कि न्याय भले देर से मिले, लेकिन दिशा सही होनी चाहिए।